ऋण की शर्तें
बराबर किस्तों से पूरी तरह चुकने वाला ऋण मानकर, अंत में कोई बड़ी किस्त नहीं।
किस्त देखकर गाड़ी चुनना ग़लत है
अवधि बढ़ा दीजिए और कोई भी गाड़ी सस्ती लगने लगेगी, क्योंकि वही क़र्ज़ ज़्यादा महीनों में बँट जाता है। कुल ब्याज उल्टी दिशा में जाता है। एक ही गाड़ी पर 36 और 72 महीने मिलाइए — आख़िर में चुकाई गई रकम का अंतर, किस्त के अंतर से कहीं बड़ा निकलेगा।
डाउन पेमेंट ब्याज को दो तरह से काटता है
पहले चुकाया गया पैसा उधार लिया ही नहीं जाता, इसलिए उस पर ब्याज कभी नहीं लगता। पाँचवाँ हिस्सा नक़द देने से किस्त पाँचवें हिस्से से घटती ही है, पूरी तालिका से ब्याज का पाँचवाँ हिस्सा भी हट जाता है।
ऋण गाड़ी की लागत नहीं है
बीमा, कर, पंजीकरण, रखरखाव और ईंधन इस गणना के बाहर हैं, और पाँच साल में इनका जोड़ अक्सर ब्याज से बड़ा हो जाता है। जो किस्त बमुश्किल निभती है, वह बाक़ी सब के लिए कोई जगह नहीं छोड़ती।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. मासिक किस्त कैसे निकलती है?
सामान्य वार्षिकी सूत्र से: हर किस्त बराबर होती है, और उसके भीतर ब्याज तथा मूलधन का बँटवारा अवधि के साथ खिसकता है। शुरू की किस्तों में ज़्यादातर ब्याज होता है, बाद वालों में ज़्यादातर मूलधन।
Q. क्या लंबी अवधि कभी समझदारी होती है?
जब विकल्प यह हो कि सचमुच ज़रूरी गाड़ी ही न ली जाए, या जब ब्याज दर बहुत कम हो। समझदारी तब ख़त्म होती है जब ऋण गाड़ी की क़ीमत से ज़्यादा जी जाए और आप उसकी क़ीमत से ज़्यादा के देनदार हो जाएँ।
Q. क्या अंत में बड़ी किस्त वाला ढाँचा संभलता है?
नहीं। यहाँ मान लिया गया है कि आख़िरी किस्त पर ऋण पूरा चुक जाता है। अंत में बड़ी एकमुश्त वाले अनुबंध की किस्त कम होती है और कुल रकम बिलकुल अलग।