संपत्ति और क़र्ज़
मुद्रा वही है जो आप डालें। असली सीमा देश, उत्पाद और बैंक की जाँच पर निर्भर है।
क़र्ज़ ÷ मूल्य × 100
5,00,000 की संपत्ति पर 3,50,000 का क़र्ज़ यानी 70% LTV; जो 30% बैंक नहीं देता, वह आपकी अपनी हिस्सेदारी है। ब्याज दर, शर्तें, और लोन मिलेगा भी या नहीं — बैंक के लगभग सारे फ़ैसले इसी एक अनुपात से शुरू होते हैं।
80% बार-बार क्यों आता है
क़रीब 80% से नीचे, संपत्ति का दाम पाँचवाँ हिस्सा गिर भी जाए तो ज़बरन बिक्री से भी क़र्ज़ चुक जाता है, इसलिए उधार देना सस्ता रहता है। इसके ऊपर बैंक जोखिम की क़ीमत वसूलने लगता है — ऊँची दर, अतिरिक्त शर्तें, या सीधा इनकार। सीमा की ठीक-ठीक संख्या देश और उत्पाद के हिसाब से बदलती है, पर तर्क हर जगह यही है।
LTV दो रास्तों से गिरता है
मूलधन की हर किश्त क़र्ज़ वाला पलड़ा हल्का करती है, और संपत्ति के दाम की हर बढ़त दूसरा पलड़ा भारी। इसीलिए 90% से शुरू हुआ LTV कुछ साल बाद बिना किसी ख़ास कोशिश के 80% से नीचे मिलता है — और दाम बढ़ने के बाद रीफ़ाइनैंस कराने पर अक्सर बेहतर शर्तें खुल जाती हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. ख़रीद का दाम लें या मूल्यांकन?
बैंक आमतौर पर दोनों में से कम वाला लेते हैं। आपने 5,00,000 दिए हों पर मूल्यांकन 4,70,000 कहे, तो अनुपात 4,70,000 पर बनेगा — लोन ऑफ़र उम्मीद से छोटा आने की एक वजह यही है।
Q. अच्छा LTV कितना है?
जितना कम, उतना सस्ता और सुरक्षित। कई बाज़ारों में मोटी लकीर 80% की है: उससे नीचे सबसे अच्छी दरें मिलती हैं, ऊपर हर उधार ली गई इकाई महँगी पड़ती है। 20% डाउन पेमेंट की सलाह असल में शुरुआत से ही इस लकीर के नीचे रहने की बात है।
Q. अपना LTV कैसे घटाऊँ?
तीन तरीक़े: शुरुआत में बड़ा डाउन पेमेंट, चलते क़र्ज़ में मूलधन चुकाना, और दाम बढ़ने के बाद नया मूल्यांकन। आख़िरी तरीक़े में मूल्यांकन की फ़ीस के अलावा कुछ ख़र्च नहीं होता।