लीज़ बनाम ख़रीद: कुल लागत
लीज़ में शुरुआती रक़म और मासिक रक़म × महीने — सब चला जाता है। ख़रीद पूरी क़ीमत चुकाती है पर आख़िर में कुछ वापस देती है, इसलिए असली ख़र्च क़ीमत घटा पुनर्बिक्री है। 3,000,000 शुरू में और 36 महीने तक 450,000 मासिक मिलकर 19,200,000; 30,000,000 में ख़रीदकर 18,000,000 में बेचना 12,000,000 — यानी 7,200,000 कम। महीने के हिसाब से लीज़ 533,333 और ख़रीद 333,333।
आपके अंक
अंतर
7,200,000
लीज़ की कुल लागत
19,200,000
ख़रीदने की कुल लागत
12,000,000
ख़रीद, प्रति महीना
333,333
सूत्र
लीज़ की कुल लागत = लीज़ का शुरुआती ख़र्च + मासिक लीज़ किराया × महीने, ख़रीदने की कुल लागत = ख़रीद मूल्य − अवशिष्ट मूल्य
यह सादा जोड़ है और यह नहीं देखता कि पैसा कब निकलता है। ख़रीद आज 30,000,000 चुकाती है जबकि लीज़ 36 महीनों में फैलती है, इसलिए वही कुल रक़म वही बोझ नहीं है। कर्ज़ लेकर ख़रीदें तो ब्याज ख़रीद वाले पाले में जोड़ें। पुनर्बिक्री का आँकड़ा एक अनुमान है, और यही एक ख़ाना नतीजा पलट देता है — 10,800,000 पर दोनों बराबर हो जाते हैं। लीज़ में शामिल मेंटेनेंस और बीमा, तय किलोमीटर से ऊपर का शुल्क तथा वापसी पर मरम्मत का बिल इस गणित के बाहर हैं।
क्या लिखना है
| इनपुट | डिफ़ॉल्ट | स्वीकार्य दायरा |
|---|---|---|
| मासिक लीज़ किरायाहर महीने जाने वाला लीज़ का किराया; देख लें कि मेंटेनेंस और बीमा उसमें है या नहीं। | 450,000 | 0 या ज़्यादा |
| महीने (माह)महीनों में गिनी गई अवधि; सालाना दर को इसके लिए बारह से भाग देते हैं। | 36 | 1 ~ 120 |
| लीज़ का शुरुआती ख़र्चकरार के समय एक बार जाने वाली रक़म — जमा और प्रोसेसिंग शुल्क यहीं आते हैं। | 3,000,000 | 0 या ज़्यादा |
| ख़रीद मूल्यशुल्क समेत जो असल में चुकाया; यह न डालें तो मुनाफ़े का हिसाब बिगड़ता है। | 30,000,000 | 0 या ज़्यादा |
| अवशिष्ट मूल्यआयु पूरी होने पर जितना मूल्य बचा माना जाता है; शून्य रखें तो पूरी लागत बँट जाती है। | 18,000,000 | 0 या ज़्यादा |
चरण दर चरण
मान के हिसाब से परिणाम
बाक़ी सब वैसा ही रखकर सिर्फ़ मासिक लीज़ किराया बदलने पर के परिणाम।
| मासिक लीज़ किराया | अंतर | लीज़ की कुल लागत | ख़रीदने की कुल लागत |
|---|---|---|---|
| 225,000 | -900,000 | 11,100,000 | 12,000,000 |
| 337,500 | 3,150,000 | 15,150,000 | 12,000,000 |
| 450,000 | 7,200,000 | 19,200,000 | 12,000,000 |
| 675,000 | 15,300,000 | 27,300,000 | 12,000,000 |
| 900,000 | 23,400,000 | 35,400,000 | 12,000,000 |
हर परिणाम का मतलब
| परिणाम | डिफ़ॉल्ट मान पर |
|---|---|
| अंतरदो मानों के बीच का फ़ासला — मात्रा, दर नहीं। | 7,200,000 |
| लीज़ की कुल लागतअवधि ख़त्म होने तक लीज़ पर जाने वाला पूरा पैसा, और आख़िर में हाथ में कोई संपत्ति नहीं। | 19,200,000 |
| ख़रीदने की कुल लागतख़रीद मूल्य में से आगे बेचने पर मिलने वाली रक़म घटाकर असल ख़र्च; कर्ज़ का ब्याज इसके ऊपर जुड़ता है। | 12,000,000 |
| ख़रीद, प्रति महीनाख़रीद की कुल लागत को उतने ही महीनों में बाँटकर। | 333,333 |
आम ग़लतियाँ
यह सादा जोड़ है और यह नहीं देखता कि पैसा कब निकलता है। ख़रीद आज 30,000,000 चुकाती है जबकि लीज़ 36 महीनों में फैलती है, इसलिए वही कुल रक़म वही बोझ नहीं है। कर्ज़ लेकर ख़रीदें तो ब्याज ख़रीद वाले पाले में जोड़ें। पुनर्बिक्री का आँकड़ा एक अनुमान है, और यही एक ख़ाना नतीजा पलट देता है — 10,800,000 पर दोनों बराबर हो जाते हैं। लीज़ में शामिल मेंटेनेंस और बीमा, तय किलोमीटर से ऊपर का शुल्क तथा वापसी पर मरम्मत का बिल इस गणित के बाहर हैं।
शब्दावली
- मासिक लीज़ किराया
- हर महीने जाने वाला लीज़ का किराया; देख लें कि मेंटेनेंस और बीमा उसमें है या नहीं।
- महीने
- महीनों में गिनी गई अवधि; सालाना दर को इसके लिए बारह से भाग देते हैं।
- लीज़ का शुरुआती ख़र्च
- करार के समय एक बार जाने वाली रक़म — जमा और प्रोसेसिंग शुल्क यहीं आते हैं।
- ख़रीद मूल्य
- शुल्क समेत जो असल में चुकाया; यह न डालें तो मुनाफ़े का हिसाब बिगड़ता है।
- अवशिष्ट मूल्य
- आयु पूरी होने पर जितना मूल्य बचा माना जाता है; शून्य रखें तो पूरी लागत बँट जाती है।
- अंतर
- दो मानों के बीच का फ़ासला — मात्रा, दर नहीं।
- लीज़ की कुल लागत
- अवधि ख़त्म होने तक लीज़ पर जाने वाला पूरा पैसा, और आख़िर में हाथ में कोई संपत्ति नहीं।
- ख़रीदने की कुल लागत
- ख़रीद मूल्य में से आगे बेचने पर मिलने वाली रक़म घटाकर असल ख़र्च; कर्ज़ का ब्याज इसके ऊपर जुड़ता है।
- ख़रीद, प्रति महीना
- ख़रीद की कुल लागत को उतने ही महीनों में बाँटकर।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. लीज़ बनाम ख़रीद: कुल लागत कैसे निकाला जाता है?
लीज़ की कुल लागत = लीज़ का शुरुआती ख़र्च + मासिक लीज़ किराया × महीने, ख़रीदने की कुल लागत = ख़रीद मूल्य − अवशिष्ट मूल्य — लीज़ में शुरुआती रक़म और मासिक रक़म × महीने — सब चला जाता है। ख़रीद पूरी क़ीमत चुकाती है पर आख़िर में कुछ वापस देती है, इसलिए असली ख़र्च क़ीमत घटा पुनर्बिक्री है। 3,000,000 शुरू में और 36 महीने तक 450,000 मासिक मिलकर 19,200,000; 30,000,000 में ख़रीदकर 18,000,000 में बेचना 12,000,000 — यानी 7,200,000 कम। महीने के हिसाब से लीज़ 533,333 और ख़रीद 333,333।
Q. एक उदाहरण से समझाइए।
मासिक लीज़ किराया 450,000, महीने 36माह, लीज़ का शुरुआती ख़र्च 3,000,000, ख़रीद मूल्य 30,000,000, अवशिष्ट मूल्य 18,000,000 पर उत्तर अंतर 7,200,000 है।
Q. क्या-क्या लिखना है?
मासिक लीज़ किराया, महीने, लीज़ का शुरुआती ख़र्च, ख़रीद मूल्य, अवशिष्ट मूल्य लिखें। लिखते ही गणना दोबारा हो जाती है, और ख़ाली खाना शून्य माना जाता है।
Q. कोई अंक बदलूँ तो परिणाम कितना हिलता है?
सिर्फ़ मासिक लीज़ किराया बदलने पर परिणाम मासिक लीज़ किराया 225,000 → अंतर -900,000 और मासिक लीज़ किराया 900,000 → अंतर 23,400,000 हो जाता है। नीचे की सारणी में पाँच चरण दिए हैं।
Q. अंक कहाँ तक गोल किए जाते हैं?
रक़म पूरी इकाई तक, प्रतिशत एक दशमलव तक और बाक़ी दो दशमलव तक दिखाए जाते हैं। दिखने वाला अंक गोल किया हुआ है; गणना बिना गोल किए मान से आगे बढ़ती है।
Q. किस बात का ध्यान रखें?
यह सादा जोड़ है और यह नहीं देखता कि पैसा कब निकलता है। ख़रीद आज 30,000,000 चुकाती है जबकि लीज़ 36 महीनों में फैलती है, इसलिए वही कुल रक़म वही बोझ नहीं है। कर्ज़ लेकर ख़रीदें तो ब्याज ख़रीद वाले पाले में जोड़ें। पुनर्बिक्री का आँकड़ा एक अनुमान है, और यही एक ख़ाना नतीजा पलट देता है — 10,800,000 पर दोनों बराबर हो जाते हैं। लीज़ में शामिल मेंटेनेंस और बीमा, तय किलोमीटर से ऊपर का शुल्क तथा वापसी पर मरम्मत का बिल इस गणित के बाहर हैं।
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